भोपाल में एक बार फिर शराब ठेकों की नीलामी का बिगुल बज चुका है। लेकिन इस बार मामला सिर्फ नीलामी का नहीं, बल्कि सरकारी लालच की नई ऊंचाई का है। पिछले साल जहां रिजर्व प्राइस 1073 करोड़ रुपए थी और उच्चतम बोली 1139 करोड़ तक पहुंची थी, वहीं इस बार सीधे छलांग लगाकर रिजर्व प्राइस 1432 करोड़ रुपए रख दी गई है। यानी साफ है सरकार को कम नहीं, और ज्यादा चाहिए।
भोपाल की 87 शराब दुकानों को 20 छोटे-छोटे ग्रुप में बांट दिया गया है। नाम दिया गया नई आबकारी नीति। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये नई व्यवस्था है या पुराने खेल का नया पैकेज? ई-टेंडर की आड़ में करोड़ों की बाजी लगेगी, और 2 मार्च को 29 दुकानों की किस्मत तय होगी।
सुबह 10:30 से दोपहर 2 बजे तक टेंडर डाले जाएंगे और शाम 6 बजे डिस्ट्रिक्ट कमेटी की मौजूदगी में इन्हें खोला जाएगा। लेकिन असली खेल फाइलों में होगा या सिस्टम में इस पर सबकी निगाहें टिकी हैं।
पहले फेज में 7 ग्रुप शामिल हैं बागसेवनिया की 5 दुकानें, हबीबगंज फाटक की 4, भानपुर चौराहा की 5, स्टेशन बजरिया की 5, खजूरीकलां की 3, जहांगीराबाद की 4 और गुनगा की 3 दुकानें। कुल 29 ठेके… और दांव पर सैकड़ों करोड़ रुपए। सरकार को उम्मीद है कि इस बार खजाना और ज्यादा भरेगा। लेकिन जनता पूछ रही है क्या शराब से ही विकास का रास्ता निकलेगा? क्या हर साल रिजर्व प्राइस बढ़ाना ही उपलब्धि है?
नीलामी की ये तारीख सिर्फ कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि एक और आर्थिक जंग का दिन है। ठेकेदार तैयारी में हैं, सिस्टम चौकन्ना है, और सरकार को इंतजार है मोटी बोली का। अब देखना ये है कि 2 मार्च को सिर्फ टेंडर खुलेंगे… या फिर कई परतें भी।







