छिंदवाड़ा के जुन्नारदेव में तीन हफ्तों से रहस्य बनी जहरीली मिठाई आखिरकार एक खौफनाक पारिवारिक साजिश निकली। जिस मिठाई को लोग भोलेपन में प्रसाद समझकर खा रहे थे, वही मिठाई तीन जिंदगियां निगल गई और दो को मौत के मुंह तक ले गई।
8 से 10 जनवरी के बीच पीएचई कार्यालय के गेट के पास लावारिस हालत में रखी मिठाई ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी थी। मिठाई खाने से चौकीदार दशरू यदुवंशी, सुंदरलाल कथुरिया और खुशबू कथुरिया की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि संतोषी कथुरिया और उनकी बेटी पूजा समय पर इलाज मिलने से बच गईं।
शुरुआत में यह एक अनजान, रहस्यमयी ज़हरखुरानी का मामला लगा, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, कहानी ने खून जमा देने वाला मोड़ ले लिया।
खाद्य एवं औषधि विभाग और विसरा जांच रिपोर्ट ने पुलिस के शक को पुख्ता कर दिया। मिठाई में 25,648 मिलीग्राम प्रति किलो आर्सेनिक पाया गया — इतनी मात्रा कि इंसान ही नहीं, हाथी तक ढेर हो जाए।
पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि यह कोई हादसा नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश थी और साजिशकर्ता कोई बाहर का नहीं, बल्कि मृतका खुशबू कथुरिया के अपने ससुराल वाले थे।
खुशबू शादी के बाद मायके में रह रही थी। ससुराल पक्ष का मानना था कि उसकी वजह से परिवार की “बदनामी” हो रही है। यही विवाद धीरे-धीरे नफरत में बदला और फिर कत्ल की योजना में तब्दील हो गया।
पुलिस ने सघन जांच और साइबर सेल की मदद से ससुर झाडू पिता गिरधारीलाल खरेटवाल (57), पति शुभम पिता झाडू कसार (24) और ननद शिवानी कसार पिता झाडू खरेटवाल (22) तीनों निवासी ग्राम थावरीकला थाना चांद को गिरफ्तार कर लिया।
आरोप है कि इन्होंने घोड़ों को दी जाने वाली ‘सोमल’ नामक आर्सेनिक दवा का इस्तेमाल कर मिठाई में ज़हर मिलाया और उसे ऐसी जगह रखा, जहां पीड़ित परिवार के लोग आसानी से उसे खा लें।
सीसीटीवी फुटेज, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और तकनीकी साक्ष्य इस केस में गेम-चेंजर साबित हुए। वारदात में इस्तेमाल की गई हीरो एचएफ डीलक्स मोटरसाइकिल और एक रेडमी स्मार्टफोन भी जब्त किया गया है।
आरोपितों पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) हत्या, 109(1) हत्या का प्रयास और 61(2) बी आपराधिक साजिश के तहत मामला दर्ज किया गया है।
इस जटिल और दिल दहला देने वाले केस को सुलझाने में जुन्नारदेव पुलिस और साइबर सेल की संयुक्त टीम की भूमिका को पुलिस अधीक्षक ने भी सराहा है।
जो मिठाई श्रद्धा का प्रतीक लग रही थी, वही तीन परिवारों के लिए मातम बन गई और यह केस एक बार फिर याद दिलाता है कि सबसे खतरनाक जहर कभी-कभी अपनों के हाथों से ही परोसा जाता है।







