माता टेकरी जहां लोग शांति, श्रद्धा और विश्वास लेकर पहुंचते हैं, वहां शनिवार दोपहर अचानक ऐसा हाहाकार मचा कि मंदिर परिसर चीखों से गूंज उठा। चामुंडा माता मंदिर के पास अचानक भड़की मधुमक्खियों ने श्रद्धालुओं और कर्मचारियों पर धावा बोल दिया।
देखते ही देखते भगदड़, चीख-पुकार और अफरा-तफरी का ऐसा मंजर बना मानो कोई अनहोनी घट गई हो। महू से दर्शन करने आए आयुष कोठारी, उनकी मां सीमा कोठारी और नानी विनीता देवी सहित तीन श्रद्धालु मधुमक्खियों के हमले का शिकार हो गए। मंदिर प्रबंधन के चार कर्मचारी—उज्जवल राव, विनय, ममता कुशवाह और होमगार्ड सैनिक अंतरसिंह भी डंक से घायल हुए।
सवाल उठता है आखिर धार्मिक स्थल पर सुरक्षा इंतजाम इतने ढीले क्यों? क्या मंदिर परिसर में बने मधुमक्खियों के छत्तों की जानकारी पहले से नहीं थी? अगर थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
घायलों को तत्काल जिला अस्पताल पहुंचाया गया। तहसीलदार कपिल गुर्जर अस्पताल पहुंचे, हालचाल लिया और बताया कि सभी की हालत सामान्य है। लेकिन क्या “स्थिति सामान्य” कह देने से जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? वन विभाग को देर रात छत्ता हटाने के निर्देश दिए गए हैं। मगर हमला पहले हो चुका है। डर पहले फैल चुका है। आस्था पर सवाल पहले उठ चुके हैं।
यह कोई पहली घटना नहीं। नेमावर में छह दिन पहले स्कूल में मधुमक्खियों ने परीक्षा के दौरान हमला कर दिया एक शिक्षक और एक छात्रा घायल। कन्नौद में तीन दिन पहले एक व्यक्ति बेहोश हो गया। चंद्रकेश्वर में स्नान कर रहे श्रद्धालुओं पर हमला करीब आठ लोग घायल। लगातार हो रही घटनाएं क्या इशारा नहीं करतीं कि खतरा बढ़ रहा है? क्या हर बार डंक लगने के बाद ही कार्रवाई होगी? आस्था के केंद्रों पर सुरक्षा सिर्फ दिखावे तक सीमित रहेगी या सच में जिम्मेदार अधिकारी जागेंगे? मधुमक्खियों का झुंड तो चला जाएगा, छत्ता भी हट जाएगा… लेकिन लापरवाही का यह डंक प्रशासन की छवि पर कितने समय तक चुभता रहेगा?







