इंदौर के तिलक नगर इलाके में बुधवार शाम एक ऐसा सन्नाटा पसरा, जिसने पूरे शहर को झकझोर दिया। 19 वर्षीय छात्रा ने अपने ही घर में फांसी लगाकर जीवन समाप्त कर लिया। परिवार के लोग उसी घर में मौजूद थे… और कमरे के अंदर मौत चुपचाप अपना काम कर रही थी।
सूचना मिलते ही तिलक नगर थाना पुलिस मौके पर पहुंची। दरवाजा खुला… अंदर एक मासूम जिंदगी फंदे से झूल रही थी। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया, लेकिन सवाल हवा में तैरते रह गए, आखिर क्यों? मृतका प्रथा, पिता परीक्षित बढ़िका की बेटी, सांईनाथ कॉलोनी की रहने वाली थी। महज 19 साल की उम्र… सपनों से भरी उम्र… लेकिन क्या उन सपनों का बोझ इतना भारी था कि सांसें ही टूट जाएं?
पढ़ाई, दबाव या खामोशी? मेडीकैप्स की छात्रा की मौत पर उठते तीखे सवाल
प्रथा मेडीकैप्स कॉलेज में बीएससी सेकंड ईयर की छात्रा थी। पुलिस के मुताबिक वह नियमित रूप से कॉलेज जाती थी, पढ़ाई कर रही थी, सब कुछ “सामान्य” था। लेकिन क्या सच में सब सामान्य था? या हम सब बस दिखावे की सामान्यता में जी रहे हैं?
आज हर घर में नंबरों की दौड़ है… हर मां-बाप को “टॉपर” चाहिए… हर समाज को “परफेक्ट” बच्चा चाहिए। लेकिन कोई यह पूछने की हिम्मत क्यों नहीं करता कि उस बच्चे के भीतर क्या चल रहा है?
कमरे का बंद दरवाजा सिर्फ लकड़ी का नहीं था… वह खामोशी का दरवाजा था। क्या परिवार ने संकेत नहीं देखे? क्या दोस्तों ने बदलाव नहीं महसूस किया? या फिर हम सब इतने व्यस्त हैं कि दर्द की आवाज सुनाई ही नहीं देती?
19 साल… यह उम्र लड़ने की होती है, हार मानने की नहीं। लेकिन जब एक छात्रा फंदा चुन लेती है, तो सिर्फ एक जान नहीं जाती हमारा सिस्टम, हमारी संवेदनहीनता और हमारा दिखावटी सामाजिक ढांचा भी कटघरे में खड़ा हो जाता है। पुलिस जांच कर रही है। वजह तलाश की जा रही है। लेकिन असली जांच तो हमें खुद से करनी होगी क्या हम अपने बच्चों को सुन रहे हैं… या सिर्फ उन्हें आंक रहे हैं?







