मध्यप्रदेश के इंदौर से एक ऐसी खबर आई है जिसने समाज के ठेकेदारों की सोच पर करारा तमाचा जड़ दिया है। सुदामा नगर की 79 वर्षीय संतोष वर्मा अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन जाते-जाते वो उन लोगों की आंखें खोल गईं जो आज भी बेटियों को “पराया धन” कहकर अपनी मानसिकता की लाश ढो रहे हैं।
चार दशक पहले पति रविशंकर के निधन के बाद अकेले पांच बेटियों को पालने वाली इस मां ने शायद तभी तय कर लिया था कि उनकी परवरिश सिर्फ घर संभालने के लिए नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने के लिए होगी। और हुआ भी वही।
जब संतोष वर्मा ने अंतिम सांस ली, तो कोई बेटा नहीं था अर्थी को कंधा देने वाला और शायद जरूरत भी नहीं थी। उनकी पांचों बेटियों मृदुला चौधरी, कुमुदिनी महालहा, कीर्ति वर्मा, वंदना वर्मा और मयूरी गालर ने न केवल मां की अर्थी को कंधा दिया, बल्कि उन परंपराओं की चिता भी जला दी जो बेटियों को अंतिम संस्कार से दूर रखती हैं।
मौत के बाद भी समाज को सबक, और पाखंडियों को जवाब
रोना-धोना, दिखावा और कर्मकांड के नाम पर खानापूर्ति करने की बजाय बेटियों ने वो किया जो असली “संस्कार” कहलाता है।
नेत्रदान, ताकि दो अंधे लोगों की जिंदगी में रोशनी लौट सके।
त्वचा दान, ताकि किसी झुलसे हुए इंसान को नई जिंदगी मिल सके।
देहदान, ताकि मेडिकल छात्र इंसानियत की किताब पढ़ सकें, सिर्फ डिग्री नहीं।
उनकी देह को Index Medical College के माध्यम से मेडिकल रिसर्च के लिए सौंप दिया गया। और शासन ने उन्हें ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ देकर सम्मानित किया वो सम्मान जो अक्सर बड़े-बड़े भाषण देने वालों को भी नसीब नहीं होता।
अब सवाल उन लोगों से है जो आज भी बेटा पैदा करने की मन्नतें मांगते हैं।
कहां हैं वो लोग जो कहते हैं “बेटा होगा तो कंधा देगा”?
कहां हैं वो जो बेटियों को बोझ समझते हैं?
इंदौर की इन बेटियों ने साबित कर दिया, कंधा देने के लिए जेंडर नहीं, जिगर चाहिए।
संस्कारों की विरासत खून से नहीं, परवरिश से चलती है।
संतोष वर्मा चली गईं, लेकिन जाते-जाते समाज की सोच को झकझोर गईं।
ये सिर्फ एक अंतिम संस्कार नहीं था, ये रूढ़ियों का दाह संस्कार था।







