धार की धरती पर खड़ा वह परिसर… जिसे सालों से आधा सच और आधा झूठ बनाकर परोसा गया। लेकिन अब सवालों के बीच एक दस्तावेज़ खड़ा है भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सर्वे रिपोर्ट। और इस रिपोर्ट का पृष्ठ संख्या 260… हाँ, वही 260… जहां दर्ज है वह शिलालेख, जो पूरे विवाद को झकझोर देता है।
यह शिलालेख महमूद शाह खिलजी के काल का बताया गया है, जो मजार के प्रवेश द्वार पर स्थापित है। रिपोर्ट के अनुसार 17वीं और 18वीं पंक्तियों में साफ़ उल्लेख है कि यहां पहले एक प्राचीन धार्मिक और शैक्षणिक केंद्र मठ विद्यमान था। वहां देवताओं की मूर्तियां थीं। और फिर? उन्हें नष्ट कर दिया गया। स्थल को मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया। तो अब सवाल ये है सच से आखिर डर किसे है? अगर एएसआई की रिपोर्ट खुद यह कह रही है, तो फिर इस ऐतिहासिक स्वीकारोक्ति पर चुप्पी क्यों? रिपोर्ट का शीर्षक ही बहुत कुछ कह देता है “भोजशाला मंदिर सह कमाल मौला मस्जिद परिसर, धार (मध्य प्रदेश) में वैज्ञानिक जांच, सर्वेक्षण और उत्खनन पर रिपोर्ट।” ध्यान दीजिए “मंदिर सह मस्जिद परिसर। रिपोर्ट में बार-बार “भोजशाला मंदिर” शब्द का प्रयोग हुआ है। लेकिन सार्वजनिक विमर्श में? वहां यह शब्द अक्सर गायब कर दिया जाता है। यहां तक कि परिसर में प्रवेश के टिकट पर भी सिर्फ “भोजशाला” लिखा है।
क्यों? इतिहास का नाम छोटा कर देने से क्या इतिहास छोटा हो जाता है?
धार, मध्य प्रदेश एक ऐतिहासिक नगरी। और उसी नगरी में स्थित भोजशाला परिसर वर्षों से विवाद के केंद्र में है। लेकिन जब खुद सरकारी सर्वेक्षण दस्तावेज़ यह स्वीकार करता है कि वहां पूर्व में धार्मिक-शैक्षणिक केंद्र था, मूर्तियां थीं, और बाद में ढांचे में परिवर्तन हुआ तो फिर बहस किस बात की? क्या इतिहास को राजनीतिक चश्मे से देखने की आदत पड़ चुकी है? क्या पृष्ठ 260 सिर्फ एक पन्ना है… या फिर वह आईना है, जिसमें सच्चाई साफ दिखती है? इतिहास को दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं। शिलालेख पत्थर पर उकेरे जाते हैं… और पत्थर की ज़ुबान बहुत लंबी होती है। अब सवाल जनता का है क्या सच को स्वीकार किया जाएगा? या फिर पृष्ठ 260 को भी धूल में दबाने की कोशिश होगी? धार की भोजशाला आज भी खड़ी है… लेकिन उसके पत्थरों में दर्ज इतिहास अब और ज़ोर से बोल रहा है।







