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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संकेत: धार्मिक कारणों से वंदे मातरम न गाने पर आपराधिक कार्रवाई होगी या नहीं?

सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम से जुड़े एक अहम मामले की सुनवाई करते हुए धार्मिक कारणों से इसे न गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि धार्मिक या अंतरात्मा से जुड़े कारणों के चलते कोई व्यक्ति वंदे मातरम नहीं गाता है, तो उसे आपराधिक परिणाम नहीं भुगतने चाहिए। हालांकि, इस मुद्दे पर अंतिम फैसला अभी नहीं आया है।

मामला कर्नाटक के चर्चित संगीतकार टीएम कृष्णा की याचिका से जुड़ा है। कृष्णा ने 2026 में हुए उस कानूनी संशोधन और केंद्र के निर्देशों को चुनौती दी है, जिनमें वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत के रूप में कानूनी संरक्षण देने और आधिकारिक कार्यक्रमों में इसके छह अंतरों के गायन से जुड़े प्रावधानों पर सवाल उठाए गए हैं।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि वंदे मातरम के अंतिम चार अंतरों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख मिलता है। उनका कहना है कि इन अंतरों को सभी लोगों के लिए अनिवार्य रूप से गाने की व्यवस्था धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों पर सवाल खड़े करती है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस सुनवाई में यह तय करने से इनकार किया कि वंदे मातरम के केवल दो अंतरे आधिकारिक रूप से गाए जाएं या सभी छह। अदालत ने कहा कि वह फिलहाल इस बात की जांच करेगी कि किसी व्यक्ति के धार्मिक या अंतरात्मा से जुड़े आपत्ति के कारण गीत न गाने पर आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं।

अदालत ने 1986 के बिजोय इमैनुएल मामले का भी संदर्भ दिया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक अंतरात्मा के आधार पर राष्ट्रगान न गाने वाले छात्रों के अधिकारों की रक्षा की थी। मौजूदा मामले में इसी संवैधानिक सिद्धांत की प्रासंगिकता पर विचार किया जा रहा है।

दरअसल, संसद ने जुलाई 2026 में Prevention of Insults to National Honour Act में संशोधन किया था। इसके तहत वंदे मातरम के गायन को जानबूझकर रोकना या उसके गायन में जुटी सभा में बाधा डालना दंडनीय बनाया गया है। ऐसे मामलों में तीन साल तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।

अब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस चुनौती पर जवाब मांगा है। केंद्र को दो सप्ताह में अपना पक्ष रखने को कहा गया है। यानी फिलहाल मामला विचाराधीन है और आगे की सुनवाई में अदालत यह स्पष्ट कर सकती है कि धार्मिक या अंतरात्मा से जुड़ी आपत्ति रखने वाले व्यक्ति पर इस कानून के तहत आपराधिक कार्रवाई की सीमा क्या होगी।

 

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