मध्य प्रदेश में खाद्य सुरक्षा विभाग की छापेमारी ने खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। होटल रेडिसन के किचन से 50 किलो सड़े हुए आलू मिलने का मामला सामने आया, वहीं सयाजी होटल के फ्रीजर में एक्सपायर्ड फिश और चिकन मिलने की बात कही गई। इसके अलावा डोमिनोज और KFC के कुछ आउटलेट्स पर चूहों के अवशेष और मक्खियां मिलने के दावे भी सामने आए हैं।
खाद्य सुरक्षा विभाग 12 से 26 सितंबर तक विशेष अभियान चलाकर मिलावट और असुरक्षित खाद्य पदार्थों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। छापेमारी हो रही है, सैंपल लिए जा रहे हैं और कई मामलों में कार्रवाई भी की जा रही है। लेकिन असली सवाल इसके बाद शुरू होता है।
पिछले पांच साल के आंकड़ों के मुताबिक 9 हजार 406 खाद्य सैंपल फेल हुए। इसके बावजूद दर्ज मामलों में करीब 97 प्रतिशत आरोपियों के खिलाफ दोष सिद्ध नहीं हो सका, जबकि केवल लगभग 3 प्रतिशत मामलों में ही सजा हुई।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि छापेमारी कितनी हुई…सवाल यह भी है कि कार्रवाई अदालत तक पहुंचने के बाद कितनी मजबूत साबित हुई?
विशेषज्ञों के मुताबिक सैंपलिंग की प्रक्रिया, जांच की गुणवत्ता, दस्तावेजी सबूत और अदालत में केस की सही पैरवी जैसे पहलू किसी भी मामले के नतीजे में अहम भूमिका निभाते हैं। अगर कार्रवाई के दौरान कानूनी प्रक्रिया में कमी रह जाए या पर्याप्त सबूत अदालत के सामने मजबूती से पेश न हो पाएं, तो मामला कमजोर पड़ सकता है।
अब खाद्य सुरक्षा विभाग के सामने दोहरी चुनौती है एक तरफ मिलावट और असुरक्षित खाद्य पदार्थों पर तत्काल कार्रवाई, और दूसरी तरफ इन मामलों को अदालत में भी मजबूती से साबित करना। क्योंकि सिर्फ छापा पड़ना और सैंपल फेल होना ही काफी नहीं है। जब तक दोष साबित होकर सजा नहीं होती, तब तक मिलावट के खिलाफ कार्रवाई का अंतिम परिणाम अधूरा ही माना जाएगा।
अब देखना यह है कि मध्य प्रदेश में चल रहा विशेष अभियान सिर्फ छापेमारी तक सीमित रहता है या मिलावटखोरों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी अपने अंजाम तक पहुंचती है।




