देश में सड़क और हाईवे नेटवर्क को मजबूत करने के लिए पिछले करीब 12 वर्षों में बड़े पैमाने पर निवेश किया गया। लेकिन अब सामने आए आंकड़े सड़क निर्माण के साथ-साथ ट्रैफिक और पर्यावरण को लेकर कई सवाल खड़े कर रहे हैं।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय से जुड़े आंकड़ों और लॉजिस्टिक्स संबंधी रिपोर्ट के अनुसार, 2014 के आसपास नेशनल हाईवे पर कारों की औसत रफ्तार करीब 45 किलोमीटर प्रति घंटा थी। 2026 में यह अलग-अलग आकलनों में करीब 52 से 58 किलोमीटर प्रति घंटा के बीच बताई गई है। यानी अधिकतम बढ़ोतरी करीब 13 किलोमीटर प्रति घंटा की रही।
इसका मतलब यह है कि 100 किलोमीटर की यात्रा में कार से मिलने वाला समय लाभ लगभग 10 मिनट के आसपास बैठता है। वहीं ट्रकों की औसत रफ्तार में बढ़ोतरी करीब 2 किलोमीटर प्रति घंटा बताई गई है।
हालांकि, तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। सरकार के अनुसार 2014 से 2026 के बीच नेशनल हाईवे नेटवर्क में काफी विस्तार हुआ है और फरवरी 2026 तक देश में नेशनल हाईवे की लंबाई करीब 1.47 लाख किलोमीटर तक पहुंच चुकी थी।
लेकिन सड़क विस्तार के साथ पर्यावरणीय लागत का सवाल भी सामने आता है। उपलब्ध दावों के मुताबिक हाईवे और स्टेट हाईवे परियोजनाओं के लिए 12 वर्षों में एक करोड़ से ज्यादा पेड़ों की कटाई हुई और दोनों को मिलाकर यह आंकड़ा डेढ़ करोड़ से अधिक बताया जा रहा है।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि देश में कितने किलोमीटर सड़क बनी, बल्कि यह भी है कि इन सड़कों से यात्रा का समय कितना कम हुआ, ट्रैफिक कितना घटा और पर्यावरण पर इसका कितना असर पड़ा।
सरकार की ओर से हाईवे विस्तार को बेहतर कनेक्टिविटी, आर्थिक गतिविधियों और लॉजिस्टिक्स सुधार से जोड़कर देखा जाता है। वहीं आंकड़ों की ऐसी तुलना यह सवाल उठाती है कि भविष्य की सड़क परियोजनाओं में निर्माण के साथ ट्रैफिक मैनेजमेंट, सार्वजनिक परिवहन और पर्यावरण संरक्षण पर कितना जोर दिया जाए।
अब बहस सिर्फ सड़क बनाने की नहीं, बल्कि ऐसी सड़क व्यवस्था तैयार करने की है जहां सफर तेज भी हो, सुरक्षित भी हो और पर्यावरणीय कीमत भी कम से कम हो।




