करीब 38 साल पुराना एक मामला अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद फिर चर्चा में है। मामला इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन यानी IOC और एक महिला उम्मीदवार सुमित्रा से जुड़ा है।
दरअसल, सुमित्रा ने कई साल पहले IOC में नौकरी के लिए आवेदन किया था। वह पद के लिए योग्य थीं, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं दी गई। वजह बताई गई कि महिला होने के कारण वह LPG सिलेंडर उठाने जैसे शारीरिक काम को नहीं कर पाएंगी।
यानी सिर्फ महिला होने के आधार पर उनकी योग्यता पर सवाल खड़ा कर दिया गया।
यह मामला लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया में चलता रहा और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सुनवाई के दौरान जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने IOC के इस रवैये पर कड़ी टिप्पणी की।
कोर्ट ने माना कि केवल महिला होने के आधार पर किसी योग्य उम्मीदवार को नौकरी से वंचित करना नारीत्व का अपमान है।
हालांकि, करीब 38 साल बीत जाने के बाद परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। सुमित्रा अब रिटायरमेंट की उम्र तक पहुंच चुकी हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अब नौकरी देने के बजाय आर्थिक मुआवजा देने का फैसला किया।
कोर्ट ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन को सुमित्रा को 12 लाख रुपए का मुआवजा देने का आदेश दिया है।
यह फैसला सिर्फ एक महिला के पुराने मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजगार में समान अवसर और लैंगिक भेदभाव के सवाल को भी सामने लाता है।
सवाल यह है कि किसी नौकरी के लिए उम्मीदवार की क्षमता का आकलन उसकी योग्यता और पद की वास्तविक जरूरतों के आधार पर होना चाहिए या सिर्फ उसके महिला होने के आधार पर?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने दशकों पुराने एक विवाद में सुमित्रा को राहत दी है और रोजगार में लैंगिक समानता से जुड़े मुद्दे पर महत्वपूर्ण संदेश दिया है।




