मध्य प्रदेश में दूध उत्पादन को लेकर सामने आए आंकड़ों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक पिछले पांच सालों में प्रदेश में दुधारू गाय और भैंसों की संख्या में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई, लेकिन इसी दौरान दूध उत्पादन 179.99 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 213.26 लाख मीट्रिक टन पहुंच गया। यानी उत्पादन में 33.27 लाख मीट्रिक टन का इजाफा दर्ज किया गया।
इसी बढ़ोतरी के दम पर मध्य प्रदेश देश के बड़े दुग्ध उत्पादक राज्यों में शामिल हो गया है। लेकिन सवाल यह है कि जब पशुओं की संख्या नहीं बढ़ी, तो इतना अतिरिक्त दूध आखिर आया कहां से?
यहीं से मिलावट और सिंथेटिक दूध का मुद्दा गंभीर हो जाता है। दूध में पानी, स्टार्च, डिटर्जेंट, यूरिया और अन्य रसायनों की मिलावट की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। हालांकि किसी सरकारी आंकड़े से यह साबित नहीं होता कि मध्य प्रदेश का 33.27 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त दूध सिंथेटिक या जहरीला है। इसलिए इस पूरे मामले में आंकड़ों की स्वतंत्र जांच और दूध की गुणवत्ता की वैज्ञानिक जांच बेहद जरूरी है।
दूसरी तरफ डेयरी कारोबारियों पर महंगाई की मार भी पड़ रही है। चारे की बढ़ती कीमत, पशुओं की देखभाल का खर्च और दूध के कारोबार में घटता मुनाफा छोटे पशुपालकों की मुश्किलें बढ़ा रहा है। ऐसे में यह दावा भी चर्चा में है कि बड़ी संख्या में छोटी डेयरियां बंद हुई हैं और कई पशुपालक पशुओं की संख्या घटाने को मजबूर हुए हैं।
तो फिर दूध उत्पादन में इतनी बड़ी छलांग कैसे लगी? क्या पशुओं की उत्पादकता वास्तव में इतनी बढ़ी है, या सरकारी उत्पादन के आंकड़ों और जमीन पर मौजूद वास्तविकता के बीच कोई अंतर है?
यह सवाल सिर्फ आंकड़ों का नहीं, बल्कि हर उस परिवार की सेहत का है जो रोज दूध खरीदकर अपने बच्चों को पिलाता है। इसलिए जरूरत है पारदर्शी जांच की पशुओं की वास्तविक संख्या से लेकर प्रति पशु दूध उत्पादन और बाजार में बिक रहे दूध की लैब टेस्टिंग तक।क्योंकि दूध सफेद है, लेकिन सवाल अब बिल्कुल साफ है अगर पशु नहीं बढ़े, तो दूध इतना बढ़ा कैसे?




