देश में चीनी की कीमतों पर दबाव बढ़ा तो बाजार में सप्लाई बनाए रखने के लिए सरकार ने 10 लाख टन चीनी आयात करने का फैसला किया है। लेकिन इसी बीच मध्य प्रदेश की बंद पड़ी चीनी मिलों का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है।
प्रदेश में कई चीनी कारखाने वर्षों से बंद हैं। कभी इन मिलों से किसानों की गन्ने की फसल को बाजार मिलता था, हजारों लोगों को रोजगार मिलता था और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती थी। लेकिन आज इनमें से कई मिलों की मशीनरी जंग खा रही है और करोड़ों की परिसंपत्तियां धीरे-धीरे जर्जर हो रही हैं।
मुरैना की कैलारस शुगर मिल को दोबारा शुरू कराने की मांग ने इस पूरे मुद्दे को नई आवाज दी है। कांग्रेस विधायक पंकज उपाध्याय ने मिल शुरू कराने की मांग को लेकर आमरण अनशन किया। सरकार की ओर से मिले आश्वासन के बाद उन्होंने अनशन समाप्त कर दिया, लेकिन किसानों और मिल कर्मचारियों की नाराजगी अभी खत्म नहीं हुई है।
सवाल सिर्फ एक मिल के बंद होने का नहीं है। सवाल यह है कि जब प्रदेश में गन्ना उत्पादन की क्षमता और चीनी मिलों का ढांचा मौजूद है, तो आखिर इन कारखानों को दोबारा चलाने में इतनी मुश्किल क्यों आ रही है?
चीनी मिलों पर भारी कर्ज, पुरानी मशीनरी, कमजोर प्रबंधन, किसानों के भुगतान से जुड़ी समस्याएं और संचालन में लगातार बढ़ती लागत बड़ी चुनौतियां मानी जाती हैं। लंबे समय तक मिल बंद रहने से हालात और बिगड़ जाते हैं।
एक तरफ देश को चीनी की जरूरत पूरी करने के लिए विदेश से आयात का सहारा लेना पड़ रहा है, तो दूसरी तरफ प्रदेश की अपनी मिलें बंद पड़ी हैं। ऐसे में किसानों और कर्मचारियों की नजर अब सरकार के आश्वासन पर है।
क्या मध्य प्रदेश की बंद चीनी मिलों को फिर से जीवन मिलेगा, या मशीनों पर जमी जंग और बढ़ती जाएगी? यही सवाल अब प्रदेश के गन्ना किसानों और हजारों प्रभावित परिवारों के सामने खड़ा है।




