मध्य प्रदेश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर हाईकोर्ट ने बड़ा और सख्त रुख अपनाया है। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के बीच सरकारी स्कूलों में शिक्षकों और बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए 17 अगस्त तक जवाब मांगा है।
यह जनहित याचिका सेंधवा के सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता बीएल जैन की ओर से दायर की गई है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि प्रदेश के लाखों छात्र आज भी संविधान और शिक्षा के अधिकार कानून के तहत मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं।
कोर्ट में पेश आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में शिक्षकों के कुल 2 लाख 89 हजार स्वीकृत पद हैं, लेकिन इनमें से करीब 1 लाख 15 हजार पद खाली पड़े हैं। यानी लगभग 40 प्रतिशत शिक्षक पद रिक्त हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि प्रदेश के 1,895 सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां एक भी शिक्षक पदस्थ नहीं है।
याचिका में कैग की 2025 की रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के 83 हजार से अधिक स्कूलों में से करीब 5 हजार स्कूलों की इमारतें जर्जर और बच्चों के लिए असुरक्षित हैं। लगभग 3,400 स्कूलों में शौचालय नहीं हैं, करीब 10 हजार स्कूल बिजली की सुविधा से वंचित हैं और लगभग 40 हजार स्कूलों में बाउंड्रीवाल तक नहीं है। कई विद्यालयों में आज भी शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं है, जबकि कुछ स्कूल झोपड़ियों में संचालित किए जा रहे हैं।
इन गंभीर तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया है। अब सभी की नजर 17 अगस्त की अगली सुनवाई पर रहेगी, जहां सरकार को बताना होगा कि प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब स्कूलों में शिक्षक ही नहीं होंगे और बच्चों को मूलभूत सुविधाएं भी नहीं मिलेंगी, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का सपना आखिर कैसे पूरा होगा?
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