मध्य प्रदेश… जहां सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी है। लेकिन हैरानी की बात ये है कि उसी प्रदेश में एमडी और एमएस जैसी सुपर स्पेशलिस्ट डिग्री हासिल करने वाले दर्जनों डॉक्टर बेरोजगार घूम रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि कई डॉक्टरों की एमबीबीएस की मूल डिग्री तक कॉलेजों में बंधक पड़ी है और बैंक का कर्ज चुकाने तक के पैसे नहीं हैं।
जानकारी के मुताबिक प्रदेश के 86 डॉक्टर, जिन्होंने एमडी और एमएस की पढ़ाई पूरी कर ली है, आज नौकरी के इंतजार में हैं। सरकारी भर्ती प्रक्रिया में देरी और विभागीय उदासीनता के कारण ये डॉक्टर न तो सरकारी अस्पतालों में सेवाएं दे पा रहे हैं और न ही अपनी आर्थिक परेशानियों से बाहर निकल पा रहे हैं।
इन डॉक्टरों ने मेडिकल शिक्षा के दौरान लाखों रुपये का एजुकेशन लोन लिया था। लेकिन नौकरी नहीं मिलने के कारण वे बैंक की किस्तें भी नहीं चुका पा रहे हैं। कई मेडिकल कॉलेजों ने फीस और अन्य औपचारिकताओं के चलते उनकी एमबीबीएस की मूल डिग्री तक अपने पास रोक रखी है, जिससे निजी क्षेत्र में भी नौकरी मिलने में दिक्कत आ रही है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों के आधे से ज्यादा पद खाली पड़े हैं, जबकि योग्य विशेषज्ञ डॉक्टर नौकरी के लिए दर-दर भटक रहे हैं। मेडिकल एजुकेशन विभाग इस मामले को स्वास्थ्य विभाग का विषय बता रहा है, वहीं स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की ओर से भी कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया।
मामला अब प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंच चुका है। पीएमओ ने राज्य के अधिकारियों से पूरे मामले में जवाब तलब किया है। अब सवाल यही है कि जब प्रदेश को डॉक्टरों की जरूरत है, तो प्रशिक्षित विशेषज्ञ डॉक्टर आखिर बेरोजगार क्यों हैं? क्या सरकारी सिस्टम की सुस्ती मरीजों और डॉक्टरों—दोनों पर भारी पड़ रही है?
एक तरफ डॉक्टरों की कमी से मरीज परेशान हैं, दूसरी तरफ योग्य डॉक्टर रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब सभी की नजर इस बात पर है कि पीएमओ की दखल के बाद क्या इन डॉक्टरों को न्याय और रोजगार मिल पाएगा।







