कानून का रखवाला ही जब सौदेबाजी पर उतर आए तो न्याय की चौखट ही आखिरी उम्मीद बनती है। मंदसौर में यही हुआ। मधुसूदन पाठक, जो खुद को सिस्टम का ताकतवर अफसर समझ बैठा था, अब सलाखों के पीछे जाएगा। विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) ने उसे रिश्वतखोरी के मामले में 5 साल की सख्त सजा और 35 हजार रुपये के जुर्माने से दंडित किया है।
मामला 2016 का है। नारकोटिक्स प्रकरण में कार्रवाई चल रही थी, लेकिन इस केस में सीबीएन की कोई भूमिका नहीं थी। फिर भी पाठक ने एक आरोपी के बेटे को डराया “तुम्हारे पिता का नाम आ रहा है… बचाना है तो पांच लाख दो।” यह सीधी धमकी थी, वर्दी की आड़ में खुली दलाली। बाद में मोलभाव कर रकम 2.50 लाख पर “सेटल” करने की कोशिश की गई। क्या कानून अब बोली पर बिकने लगा था?
पीड़ित ने हिम्मत दिखाई और शिकायत पहुंची लोकायुक्त संगठन उज्जैन तक। 11 अगस्त 2016 को निरीक्षक कमल निगवाल की टीम ने मधुसूदन पाठक को 30 हजार रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ लिया। उस दिन वर्दी की अकड़ धरी रह गई।
जांच पूरी हुई, अदालत में सुनवाई चली और आखिरकार न्याय ने दस्तक दी। अदालत ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(डी) के तहत 5 साल की सजा और 25 हजार रुपये जुर्माना, तथा धारा 8 के तहत 4 साल की सजा और 10 हजार रुपये अर्थदंड सुनाया।
यह फैसला सिर्फ एक अफसर की सजा नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों के लिए चेतावनी है जो कुर्सी को कमाई का जरिया समझते हैं। सवाल साफ है—जब जांच एजेंसी का कोई रोल ही नहीं था, तो फिर यह वसूली किस अधिकार से की जा रही थी?
मंदसौर की इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वर्दी अगर ईमानदार हाथों में न हो, तो वही सुरक्षा का प्रतीक डर का हथियार बन जाती है। लेकिन इस बार न्याय की हथौड़ी ने साफ संदेश दिया है रिश्वत की कीमत अब सलाखें हैं।







